Tuesday, 11 August 2015

देवों के देव महादेव भगवान शंकर का महीना


क्यों है सावन की विशेषता?
12 ज्योतिर्लिंग का दर्शन जगकल्याण के माध्यम से

भारत के सभी शिवालयों में श्रावण सोमवार पर हर-हर महादेव और बोल बम बोल की गूँज सुनाई देगी। श्रावण मास में शिव-पार्वती का पूजन बहुत फलदायी होता है। इसलिए सावन मास का बहुत महत्व है।
हिन्दू धर्म की पौराणिक मान्यता के अनुसार सावन महीने को देवों के देव महादेव भगवान शंकर का महीना माना जाता है। इस संबंध में पौराणिक कथा है कि जब सनत कुमारों ने महादेव से उन्हें सावन महीना प्रिय होने का कारण पूछा तो महादेव भगवान शिव ने बताया कि जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति से शरीर त्याग किया था, उससे पहले देवी सती ने महादेव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण किया था।





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अगस्त माह 2015 में जगकल्याण

अगस्त माह 2015  में जगकल्याण
पत्रिका के मुख्य आकर्षण - 








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Wednesday, 6 August 2014

Bhagat Sudama

भक्त सुदामा
Krishna_Sudama

प्रभु के भक्तों की अनेक कथाएं हैं, सुनते-सुनते आयु बीत जाती है पर कथाएं समाप्त नहीं होतीं| सुदामा श्री कृष्ण जी के बालसखा हुए हैं| उनके बाबत भाई गुरदास जी ने एक पउड़ी उच्चारण की है -

बिप सुदामा दालदी बाल सखाई मित्र सदाऐ |
लागू होई बाहमणी मिल जगदीस दलिद्र गवाऐ |
चलिया गिणदा गट्टीयां क्यों कर जाईये कौण मिलाऐ |
पहुता नगर दुआरका सिंघ दुआर खोलता जाए |
दूरहुं देख डंडउत कर छड सिंघासन हरि जी आऐ |
पहिले दे परदखना पैरीं पै के लै गल लाऐ |
चरणोदक लै पैर धोइ सिंघासन ऊपर बैठाऐ |
पुछे कुसल पिआर कर गुर सेवा की कथा सुनाऐ |
लै के तंदुल चबिओने विदा करै आगे पहुंचाऐ |
चार पदारथ सकुच पठाए |९|९०|

भाई गुरदास जी के कथन अनुसार सुदामा गोकुल नगरी का एक ब्राह्मण था| वह बड़ा निर्धन था| वह श्री कृष्ण जी के साथ एक ही पाठशाला में पढ़ा करता था| उस समय वह बच्चे थे| बचपन में कई बच्चों का आपस में बहुत प्यार हो जाता है, वे बच्चे चाहे गरीब हो या अमीर, अमीरी और गरीबी का फासला बचपन में कम होता है| सभी बच्चे या विद्यार्थी शुद्ध हृदय के साथ मित्र और भाई बने रहते हैं|

सुदामा और कृष्ण जी का आपस में अत्यन्त प्रेम था, वह सदा ही इकट्ठे रहते| जिस समय उनका गुरु उनको किसी कार्य के लिए भेजता तो वे इकट्ठे चले जाते, बेशक नगर में जाना हो या किसी जंगल में लकड़ी लेने| दोनों के प्रेम की बहुत चर्चा थी|

सुदामा जब पढ़ने के लिए जाता था तो उनकी माता उनके वस्त्र के पलड़े में थोड़े-से भुने हुए चने बांध दिया करती थी| सुदामा उनको खा लेता था, ऐसा ही होता रहा|

एक दिन गुरु जी ने श्री कृष्ण और सुदामा दोनों को जंगल की तरफ लकड़ियां लेने भेजा| जंगल में गए तो वर्ष शुरू हो गई| वे एक वृक्ष के नीचे बैठ गए| बैठे-बैठे सुदामा को याद आया कि उसके पास तो भुने हुए चने हैं, वह ही खा लिए जाए| वह श्री कृष्ण से छिपा कर चने खाने लगा| उसे इस तरह देख कर श्री कृष्ण जी ने पूछा-मित्र! क्या खा रहे हो?

सुदामा से उस समय झूठ बोला गया| उसने कहा-सर्दी के कारण दांत बज रहे हैं, खा तो कुछ नहीं रहा, मित्र!

उस समय सहज स्वभाव ही श्री कृष्ण जी के मुख से यह शब्द निकल गया -'सुदामा! तुम तो बड़े कंगाल हो, चनों के लिए अपने मित्र से झूठ बोल दिया|'

यह कहने की देर थी कि सुदामा के गले दरिद्र और कंगाली पड़ गई, कंगाल तो वह पहले ही था| मगर अब तो श्री कृष्ण ने वचन कर दिया था| यह वचन जानबूझ कर नहीं सहज स्वभाव ही श्री कृष्ण के मुख से निकल गया, पर सत्य हुआ| सुदामा और अधिक कंगाल हो गया|

पाठशाला का समय खत्म हो गया और सुदामा अपने घर चला गया| विवाह हुआ, बच्चे हुए तथा उसके पश्चात माता-पिता का देहांत हो गया| कंगाली दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी, कोई फर्क न पड़ा| दिन बीतने लगे| श्री कृष्ण जी राजा बन गए, उनकी महिमा बढ़ गई| वह भगवान रूप में पूजा जाने लगे तो सुदामा बड़ा खुश हो का अपनी पत्नी को बताया करता कि हम दोनों का परस्पर अटूट प्रेम होता था|

उसकी पत्नी कहने लगी -'यदि आपके ऐसे मित्र हैं और आप में इतना प्रेम था तो आप उनके पास जाओ और अपना हाल बताओ| हो सकता है कि कृपा तथा दया करके हमारी कंगाली दूर कर दें|'

अपनी पत्नी की यह बात सुन कर सुदामा ने कहा -'जाने के लिए तो सोचता हूं, पर जाऊं कैसे, श्री कृष्ण के पास जाने के लिए भी तो कुछ न कुछ चाहिए, आखिर हम बचपन के मित्र हैं|'

आखिर उसकी पत्नी ने बहुत ज़ोर दिया तो एक दिन सुदामा अपने मित्र श्री कृष्ण कि ओर चल पड़ा| उसकी पत्नी ने कुछ चावल, तरचौली उसको एक पोटली में बांध दिए| सुदामा मन में विचार करता कि मित्र को कैसे मिलेगा? क्या कहेगा? द्वारिका नगरी में पहुंच कर वह श्री कृष्ण जी का दरबार लगता था| प्रभु वहां इंसाफ और न्याय करते थे| सुदामा ने डरते और कांपते हुए द्वारपाल को कहा - 'मैंने राजा जी को मिलना है|'

द्वारपाल-'क्या नाम बताऊं जा कर?'

सुदामा-उनको कहना सुदामा ब्राह्मण आया है, आपके बचपन का मित्र| द्वारपाल यह संदेश ले कर अंदर चला गया| जब उसने श्री कृष्ण जी को संदेश दिया तो वह उसी पल सिंघासन से उठ कर नंगे पांव बाहर को भागे तथा बाहर आ कर सुदामा को गले लगा लिया| कुशलता पूछी तथा बड़े आदर और प्रेम से उसे अपने सिंघासन पर बिठाया और उसके पैर धोए| पास बिठा कर व्यंग्य के लहजे में कहा - लाओ मेरी भाभी ने मेरे लिए क्या भेजा है?

यह कह कर श्री कृष्ण ने सुदामा के वस्त्रों से बंधी हुई पोटली खोल ली और फक्के मार कर चबाने लगे| चबाते हुए वर देते गए तथा कहते रहे, "वाह! कितनी स्वादिष्ट है तरचौली! कितनी अच्छी है भाभी!"

सुदामा प्रसन्न हो गया| श्री कृष्ण ने मित्र को अपने पास रखा तथा खूब सेवा की गई| बड़े आदर से उसको भेजा| विदा होते समय न तो सुदामा ने श्री कृष्ण से अपनी निर्धनता बताते हुए कुछ मांगा तथा न ही मुरली मनोहर ने उसे कुछ दिया| सुदामा जिस तरह खाली हाथ दरबार की तरफ गया था, वैसे ही खाली हाथ वापिस घर को चल पड़ा| मार्ग में सोचता रहा कि घर जाकर अपनी पत्नी को क्या बताऊंगा? मित्र से क्या मांग कर लाया हूं|

सुदामा गोकुल पहुंचा| जब वह अपने मुहल्ले में पहुंचा तो उसे अपना घर ही न मिला| वह बड़ा हैरान हुआ| उसका कच्चा घर जो झौंपड़ी के बराबर घास फूस से बना गाय बांधने योग्य था, कहीं दिखाई न दिया| वह वहां खड़ा हो कर पूछना ही चाहता था कि इतने में उसका लड़का आ गया| उसने नए वस्त्र पहने हुए थे| 'पिता जी! आप बहुत समय लगा कर आए हो|.....द्वारिका से आए जिन आदमियों को आप ने भेजा था, वह यह महल बना गए हैं, सामान भी छोड़ गए हैं तथा बहुत सारे रुपये दे गए हैं| माता जी आपका ही इंतजार कर रहे हैं| आप आकर देखें कितना सुंदर महल बना है|'

अपने पुत्र से यह बात सुन कर तथा कच्चे घर की जगह सुन्दर महल देख कर वह समझ गया कि यह सब भगवान श्री कृष्ण की लीला है| श्री कृष्ण ने मुझे वहां अपने पास द्वारिका में रखा और मेरे पीछे से यहां पर यह लीला रचते रहे तथा मुझे बिल्कुल भी मालूम नहीं पड़ने दिया| महल इतना सुन्दर था कि, उस जैसा किसी दूसरे का शायद ही हो| शायद महल बनाने के लिए विश्वकर्मा जी स्वयं आए थे, तभी तो इतना सुन्दर महल बना| भगवान श्री कृष्ण की लीला देख कर सुदामा बहुत ही प्रसन्न था| उसके बिना कुछ बताए ही श्री कृष्ण जी सब कुछ समझ गए थे|

उस दिन के बाद सुदामा श्री कृष्ण की भक्ति में लग गया और भक्तों में गिने जाने लगा|

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Bhagat Meera Bai Ji

भक्त मीरा बाई जी

राजस्थान की भूमि साहस व शौर्य के लिए प्रसिद्ध है| भारत में हुए साठ प्रतिशत युद्ध इसी राज्य की जमीन पर हुए| युद्धों की इस भूमि पर प्रेम की मूर्ति भी अवतरित हुई जिसका नाम था मीरा!

परिचय:

मीरा का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं| वह श्री कृष्ण जी की अनन्य भक्त थी| मीरा का जन्म 1498 में हुआ| इनके पिता मेड़ता के राजा थे| जब मीरा बाई बहुत छोटी थी तो उनकी माता ने श्री कृष्ण जी को यू ही उनका दूल्हा बता दिया| इस बात को मीरा जी सच मान गई| उन पर इस बात का इतना प्रभाव पड़ा कि वह श्री कृष्ण जी को ही अपना सब कुछ मान बैठी|

जवानी की अवस्था में पहुँचने पर भी उनके प्रेम में कमी नहीं आई| ओर युवतियों की तरह वह भी अपने पति को लेकर विभिन्न कल्पनाएँ करती| परन्तु उनकी कल्पनाएँ, उनके सपने श्री कृष्ण जी से आरम्भ होकर उन्ही पर ही समाप्त हो जाते|

समय बीतता गया| मीरा जी का प्यार कृष्ण के प्रति और बढता गया| 1516 ई० में मीरा का विवाह मेवाड़ के राजकुमार भोजराज से कर दिया गया| वे मीरा के प्रति स्नेह का भाव रखते थे परन्तु मीरा का ह्रदय माखन चोर ने चुरा लिया था| वह अपने विवाह के बाद भी श्री कृष्ण की आराधना न छोड़ सकी| वह कृष्ण को ही अपना पति समझती और वैरागिनो की तरह उनके भजन गाती| मेवाड़ के राजवंश को यह कैसे स्वीकार हो सकता था कि उनकी रानी वैरागिनी की तरह जीवन व्यतीत करे| उन्हें मरने की साजिशे रची जाने लगी| मीरा की भक्ति, प्रेम निश्छल था इसलिए विष भी अमृत हो गया| उन्होंने अपना पूरा जीवन कृष्ण को ही समर्पित कर दिया| उनका कहना था -

मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों न कोई|
जाके सिर मोर मुकट मेरो पति सोई||

तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई|
छाड़ि दई कुलकि कानि कहा करिहै कोई||


मीरा ने गुरु के विषय में कहा है कि बिना गुरु धारण किए भक्ति नहीं की जा सकती| भक्तिपूर्ण व्यक्ति ही प्रभु प्राप्ति का भेद बता सकता है वही सच्चा गुरु है| स्वयं मीरा के पद से पता चलता है कि उनके गुरु रविदास थे|

नहिं मैं पीहर सासरे, नहिं पियाजी री साथ|
मीरा ने गोबिन्द मिल्या जी, गुरु मिलिया रैदास||

उन्होंने धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध शूद्र गुरु रविदास की भक्ति की|साधु - संतो की संगत की|

मीरा की मृत्यु के बारे में अलग-अलग मत हैं|

लूनवा के भूरदान ने मीरा की मौत 1546 में बताई|
रानीमंगा के भाट ने मीरा की मौत 1548 में बताई|
डा० शेखावत अपने लेख और खोज के अधार पर मीरा की मौत 1547 में बताते हैं|


हरमेन गोएटस ने मीरा के द्वारका से गायब होने की कड़ियों को जोड़ने का प्रयास किया परन्तु वह मौलिक नहीं| उनके अनुसार वह द्वारका के बाद उत्तर भारत में भ्रमण करती रही| उसने भक्ति व प्रेम का संदेश सब जगह पहुँचाया| चित्तौड़ के शासक कर्मकांड व राजसी वैभव में डूबकर उसे भूल चुके थे| किसी ने उसे ढूँढने का प्रयास नहीं किया|

अपने पांच वर्ष की अवस्था में मीरा ने गिरधर का वरण किया और उसी दिव्यमूर्ति में विलीन हो गई| धन्य है वह प्रेम की मूर्ति! जिसने दैविक प्रेम का ऐसा उदाहरण दिया कि बड़े-बड़े संत, भक्त की चमक भी धीमी पड़ गई|

साहितिक देन:

मीरा जी ने विभिन्न पदों व गीतों की रचना की| मीरा के पदों मे ऊँचे अध्यात्मिक अनुभव हैं| उनमे समाहित संदेश और अन्य संतो की शिक्षा मे समानता नजर आती हैं| उनके प्रप्त पद उनकी अध्यात्मिक उन्नति के अनुभवों का दर्पण हैं| मीरा ने अन्य संतो की तरह कई भाषाओं का प्रयोग किया है जैसे -
हिन्दी, गुजरती, ब्रज, अवधी, भोजपुरी, अरबी, फारसी, मारवाड़ी, संस्कृत, मैथली और पंजाबी|

भावावेग, भावनाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति, प्रेम की ओजस्वी प्रवाहधारा, प्रीतम वियोग की पीड़ा की मर्मभेदी प्रखता से अपने पदों को अलंकृत करने वाली प्रेम की साक्षात् मूर्ति मीरा के समान शायद ही कोई कवि हो|
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रक्षाबंधन की कहानी

रक्षाबंधन का त्योहार श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर बलि राजा के अभिमान को इसी दिन चकानाचूर किया था। इसलिए यह त्योहार 'बलेव' नाम से भी प्रसिद्ध है। महाराष्ट्र राज्य में नारियल पूर्णिमा या श्रावणी के नाम से यह त्योहार विख्यात है। इस दिन लोग नदी या समुद्र के तट पर जाकर अपने जनेऊ बदलते हैं और समुद्र की पूजा करते हैं।



रक्षाबंधन के संबंध में एक अन्य पौराणिक कथा भी प्रसिद्ध है। देवों और दानवों के युद्ध में जब देवता हारने लगे, तब वे देवराज इंद्र के पास गए। देवताओं को भयभीत देखकर इंद्राणी ने उनके हाथों में रक्षासूत्र बाँध दिया। इससे देवताओं का आत्मविश्वास बढ़ा और उन्होंने दानवों पर विजय प्राप्त की। तभी से राखी बाँधने की प्रथा शुरू हुई। दूसरी मान्यता के अनुसार ऋषि-मुनियों के उपदेश की पूर्णाहुति इसी दिन होती थी। वे राजाओं के हाथों में रक्षासूत्र बाँधते थे। इसलिए आज भी इस दिन ब्राह्मण अपने यजमानों को राखी बाँधते हैं।

रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के पवित्र प्रेम का प्रतीक है। इस दिन बहन अपने भाई को प्यार से राखी बाँधती है और उसके लिए अनेक शुभकामनाएँ करती है। भाई अपनी बहन को यथाशक्ति उपहार देता है। बीते हुए बचपन की झूमती हुई याद भाई-बहन की आँखों के सामने नाचने लगती है। सचमुच, रक्षाबंधन का त्योहार हर भाई को बहन के प्रति अपने कर्तव्य की याद दिलाता है।

राखी के इन धागों ने अनेक कुरबानियाँ कराई हैं। चित्तौड़ की राजमाता कर्मवती ने मुग़ल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजकर अपना भाई बनाया था और वह भी संकट के समय बहन कर्मवती की रक्षा के लिए चित्तौड़ आ पहुँचा था। आजकल तो बहन भाई को राखी बाँध देती है और भाई बहन को कुछ उपहार देकर अपना कर्तव्य पूरा कर लेता है। लोग इस बात को भूल गए हैं कि राखी के धागों का संबंध मन की पवित्र भावनाओं से हैं।

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DHARMMARG: 12 ज्योतिर्लिंग यात्रा

DHARMMARG: 12 ज्योतिर्लिंग यात्रा: सौराष्ट्रे सोमनाथ च श्री शैले मल्लिकार्जुनम, उज्जयिन्या महाकाल, मोंधारे परमेश्वरम, केदार हिमवत्पृष्ठे, डाकिन्या भीमशंकरम वारासास्था च विश्...

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DHARMMARG: Mahavir Hanuman Mandir Patna

DHARMMARG: Mahavir Hanuman Mandir Patna: महावीर हनुमान मंदिर पटना जहाँ दर्शन मात्र से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं बन जाते हैं बिगड़े काम, मिल जाता है जग में उत्तम स्थान Maha...

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Wednesday, 6 November 2013

DHARMMARG: आस्था का पर्व है छठ

DHARMMARG: आस्था का पर्व है छठ: छठ पर्व छठ, षष्टी का अपभ्रंश है। कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली मनाने के तुरंत बाद मनाए जाने वाले इस चार दिवसिए व्रत की सबसे कठिन और ...

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DHARMMARG: गोवर्धन पूजा – भगवान श्री कृष्ण की अद्भुत लीला

DHARMMARG: गोवर्धन पूजा – भगवान श्री कृष्ण की अद्भुत लीला: Govardhandhari Krishnamurari कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन उत्सव मनाया जाता है । इस दिन अन्न कुट, मार्गपाली आदि उत्...

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DHARMMARG: मोक्ष देती हैं ये सप्तपुरियां

DHARMMARG: मोक्ष देती हैं ये सप्तपुरियां: ये सभी सप्तपुरियां भगवान शिव को बहुत प्रिय और भक्तों के लिए मोक्षदायिनी हैं। श्रावण मास के दौरान यक्ष, किन्नर, देव, मनुष्य और दानव भी इन स...

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DHARMMARG: श्याम चूड़ी बेचने आया

DHARMMARG: श्याम चूड़ी बेचने आया: मनहारी का भेस बनाया, श्याम चूड़ी बेचने आया। छलिया का भेस बनाया, श्याम चूड़ी बेचने आया॥ झोली कंधे धरी, उस में चूड़ी भरी। गलिओं में चोर म...

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DHARMMARG: केरवा जे फरेला घवद से

DHARMMARG: केरवा जे फरेला घवद से: केरवा जे फरेला घवद से ओह पर सुगा मेड़राय उ जे खबरी जनइबो अदिक (सूरज) से सुगा देले जुठियाए उ जे मरबो रे सुगवा धनुक से सुगा गिरे मुरझाय उ ...

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Monday, 17 June 2013

ज़िंदगी की धुन पर मौत का नाच

सारी दुनिया बंधी है कालबेलिया के जादू में पर इसके फ़नकार अब भी तलाश रहे अपनी पहचान

धीरे-धीरे रात गहरा रही है। दिन भर खेल-कूदकर बच्चे थक गए हैं पर निंदिया रानी पलकों से दूर हैं। बच्चे जब सोते नहीं, बार-बार शरारतें करते हैं, तब दादी शुरू करती हैं—एक राजकुमारी की कहानी। राजकुमारी, जिससे प्यार करता है राजकुमार। सफेद घोड़े पे आता है, उसे अपने साथ ले जाता है। बच्चे जब तक सपनों में डूब नहीं जाते, `हां...’, `और क्या हुआ...’, `आगे...’ बुदबुदाते हुए, आंखें खोले, टकटकी लगाए सुनते रहते हैं। कमाल है कि दादी की किस्सों वाली पोटली कभी खाली नहीं होती। उसमें से निकलते जाते हैं एक के बाद एक अनूठे, मज़ेदार, अनोखे किस्से। राजकुमारी के बाद जादूगर, जिसकी जान चिड़िया के दिल में कैद है और फिर नाग-नागिन की बातें। हां...डर रहे हैं बच्चे, सिमट रहे हैं खुद में, सट रहे हैं एक-दूसरे से और सुनते ही जा रहे हैं नाग-नागिन के जोड़े के बारे में। उनसे जुड़ी कितनी ही कहानियां...। मन मोह लेती हैं नाग-नागिन की रहस्यमयी कथाएं। इच्छाधारी नागिन का प्रेमी नाग से मिलना, फिर नाग की हत्या, नागिन का बदला और भी पता नहीं क्या-क्या।
जितनी पुरानी दुनिया है, कुदरत है, उतनी ही तो पुरानी हैं नाग-नागिन की कहानियां। उनके किस्से, अफ़साने और हां, उसी तरह प्राचीन हैं सपेरे और उनका संसार।
बीन बजाता संपेरा याद है? उसकी वो पोटली, जिसमें से पूंछ पकड़कर, कभी गर्दन से थामकर संपेरा सांप निकालता है। ओह...ये क्या, कैसा डरावना सांप है, पर संपेरे नहीं डरते। खेलते हैं ज़हरीले सांपों से। वही क्यों...उनके छोटे-छोटे बच्चे तक, जो बोल तक नहीं पाते, फिर भी नाग का मुंह खोलकर उसके दांत गिनने की कोशिश जो करते हैं।
ये हैं संपेरे, जो मौत के सौदागर सांपों को थामकर, उनका नाच दिखाकर रोजी-रोटी की लड़ाई लड़ते हैं। दिन भर सांपों की तलाश करने या फिर घर-घर उनकी नुमाइश कर शाम तक जुटाते हैं दो रोटी लायक थोड़ा-सा पैसा।
ये हालत यूपी-बिहार के ही संपेरों की नहीं, पूरे देश में संपेरे खुद का अस्तित्व बचाने की जद्दोज़हद कर रहे हैं, लेकिन वो हुनर ही क्या, जो गरीबी के अंधेरे में गुम हो जाए। यही वज़ह है कि संपेरों के फ़न की चमक कहीं कम नहीं हुई है।
इसी सिलसिले में एक सवाल पूछ लें आपसे? राजस्थान की घुमक्कड़ जनजाति कालबेलिया का नाम सुना है? वही कालबेलिया, जिसके नृत्य की धमक से सारी दुनिया गुलज़ार हो रही है। काले कपड़े पहनकर जब कालबेलिया समुदाय की लड़कियां तेज़-तेज़ कदमों के साथ लयात्मक नृत्य करती हैं, तो जैसे कुदरत की हर हरकत ठहर जाती है। सासें थमकर सुनती हैं—जादुई धुन, आंखें देखती हैं अनूठे लोकनृत्य की धूम।
रेतीले रेगिस्तान के बीच बसे गांवों में हर दिन गर्मी से झुलसाता है और रातें ठिठुरन से भर जाती हैं। ऐसे में, कहीं, किसी मौके पर सजती है महफ़िल। महफ़िलें जवान होने के लिए किन्हीं खास मौकों का इंतज़ार कहां करती हैं...ऐसे ही धीरे-धीरे सुलगती लकड़ियां चटखती हैं और फिर धीरे-धीरे शोले परवान चढ़ते हैं। फिर उनके सामने आ जाती हैं दो महिलाएं। ये किसी भी उम्र की हो सकती हैं, यूं, ज्यादातर ये युवा ही होती हैं। 
कालबेलिया जनजाति की युवतियां थिरकना शुरू करती हैं और उनके साथ-साथ ढोरों से होती हुई कसक भरी आवाज़ गूंजती है।
सपेरों का ये नाच ग़ज़ब है। कालबेलिया युवतियों की लोच से भरपूर देह बल खाती है और उन्हें देखने वाले सांसें रोककर जिस्म की हर हरकत देखते हैं...सुध-बुध भुलाकर देखते हैं ग़ज़ब का कालबेलिया नाच।
कसीदाकारी की कलाकारी से भरपूर घेरदार काले घाघरे पर लगे कांच में लपटों की झलक दिखती है। इकहरी-पतली लचकदार देह पे सजा होता है खूब घेरदार घाघरा...घेरदार परतों के बीच लाल, नीली, पीली और रूपहले रिबन से सजी गोट और गोल-गोल शीशे।
जिस्म लहराता है, साथ ही हाथ ज़मीन पर टिक जाते हैं। नर्तकी पीछे को झुकती हुई घूम जाती है। जैसे बदन हाड़-मांस से नहीं बना, रबड़ से तैयार किया गया हो। पैर और गर्दन एक लय पर घूमते हैं। मुस्कराती हैं आंखें और होंठ भी साथ-साथ। नैनों की कटार खाकर हर कोई एकसाथ कह उठता है—`आह और वाह’!

'म्हारो अस्सी कली को घाघरो' की तान छेड़ती नर्तकियां क्या हैं। हर चक्कर के साथ जैसे केंचुल छोड़कर जन्म लेती हुई सांप की बेटी, ताज़ा-ताज़ा पैदा हुई नागिन-सी। मोहक, रहस्यमय, धारदार और उल्लास से भरा यौवन। कौन सोचेगा...अभावों में निखरा हुआ सौंदर्य है ये।
रात गुज़रती जाती है पर कालबेलिया की थिरकन कम नहीं होती। ओढ़नी ओढ़े कालबेलिया युवतियां गोल-गोल घेरे में नाचती हैं, फिरकनी की तरह। उनकी रफ्तार में तब-तब बदलाव आता है, जैसे-जैसे राजस्थानी लोकगीतों की सुरलहरियों में उतार-चढ़ाव शामिल होता है। संगीत भी मादक होता है। एक तरफ बीन की मदमाती धुन, दूसरी ओर ढपली का जादू...। लड़कियां नृत्य करती हैं और साज़ पर तैनात होते हैं सपेरे, यानी पुरुष। ये महिला सशक्तीकरण की मिसाल है, जहां पुरुष सहयोगी की मुद्रा में है। वो नेता नहीं, साथी है, सरदार नहीं, सिपाही है।
पुरुष सहयोगी के हाथ बाज़ों पर तड़पते हैं और बिजली कड़कने जैसी ताल के साथ कालबेलिया लड़कियां नाचती जाती हैं। कहीं कोई पास में ही बैठा तान देता है। ये कोई भी हो सकता है, कोई पुरुष या फिर स्त्री। 
कालबेलिया मनोरंजन के लिए किया जाने वाला कोई आम नृत्य नहीं है। थिरकन के इस जादू में छिपा है जीवन का गहरा संदेश...मृत्यु सत्य है। वो आनी ही है। उसका सामना करो।
जैसे, शिव ने संसार की रक्षा के लिए विष पिया। ज़हर को गले में रोकने के लिए नीलकंठ हो गए, वैसे ही तो संपेरन लड़कियां कालबेलिया नृत्य करती हैं। यही बताती हुई—मृत्यु का सामना करना जानो। उनकी मुद्रा बताती है—हम अभाव में जीते हैं, फिर भी ज़िंदगी को ज़हर नहीं समझते।
कालबेलिया घुमक्कड़ जाति है। नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे सांप पकड़ने, उनका प्रदर्शन करने के अलावा, और कोई हुनर उनके पास नहीं है। हां, कुछ कालबेलिया आटा पीसने की चक्की और खरल-बट्टा भी बनाते रहे हैं। बीते कुछ साल में ज़रूर उनमें ठहराव आया है, लेकिन रोजमर्रा की ज़रूरतें पूरी करने के लिए अब भी जद्दोज़हद करनी पड़ती है।
राजस्थान की तमाम घुमंतू जातियां पुख्ता पहचान के लिए जूझ रही हैं। ये मूलभूत सुविधाओं के लिए सरकार का मुंह देखते हैं और बस बिसूरते रहने को मज़बूर हैं।
बंजारा, कालबेलिया और खौरूआ जाति के लोगों के पास राशन कार्ड और फोटो पहचान पत्र तक नहीं होते, ऐसे में उन्हें नरेगा जैसी योजनाओं का फायदा नहीं मिल पाता। राजस्व रिकॉर्ड में कालबेलिया के नाम के साथ नाथ या जोगी लिखा जाता है। वो गरीबी रेखा से नीचे के वर्ग में भी शामिल नहीं किए जाते। ऐसी हालत में संपेरे अपने सुनहरे दिनों के आने का कभी ना खत्म होने वाला इंतज़ार ही करते जा रहे हैं।
ये दीगर बात है कि कालबेलिया नृत्य ज़रूर संपेरों के ख्वाबों, ज़िंदगी की यात्रा और सोच को ऊंचाई तक ले जा रहा है। ऐसी ऊंचाई, जिस तक पहुंचने का ख्वाब दुनिया के बड़े-बड़े कलाकार देखते हैं।
इन्हीं संपेरों के बीच की एक लड़की है धनवंती। धनतेरस के दिन जन्मी थी, इसलिए नाम पड़ा धनवंती। बचपन और जवानी दोनों मुफलिसी में गुज़री पर आज के दिन वो धन और शान, दोनों का पर्याय बन गई है। 1985 में हरियाणा की एक पत्रिका ने उसे पहली बार गुलाबो नाम दिया और फिर तो यही नाम कालबेलिया का पर्याय बन गया।
153 देशों में प्रस्तुतियां दे चुकीं गुलाबो को 1991 में राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। वो लंदन के अलबर्ट हॉल में परफॉर्म कर चुकी हैं, ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ तक से सराहना पा चुकी हैं, लेकिन 90 के दशक से पहले वो ख़तरनाक सांपों की खिलाड़न भर थीं। सांप नचाकर लोगों का मनोरंजन करती गुलाबो आज राजस्थानी लोकनृत्य कालबेलिया की पहचान बन गई हैं। देश की सरहदों से पार, परदेस में जगह-जगह कालबेलिया पेश कर वाहवाही हासिल कर चुकी गुलाबो का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। राजस्थान के लोग अपनी संपेरन-जादूगरनी-कलाकार गुलाबो का ज़िक्र बड़ी इज़्ज़त के साथ करते हैं। वो चाहती हैं, इस नृत्य का सम्मान और बढ़े। अपने पिता को याद करते हुए गुलाबो कहती हैं—बापू मुझे समझाते थे, कुछ भी करना पर चोरी की राह पर ना चलना। मेरे लिए जीवन का यही मूलमंत्र है।
गुलाबो और उन जैसी दीवानी नृत्यांगनाओं के ज़रिए कालबेलिया की धमक कहां नहीं पहुंची। मौजूदा साल में भारत ने कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी की। खेलों के उद्घाटन समारोह की शान भी कालबेलिया नृत्य ने ही बढ़ाई। गुलाबो के दल का हिस्सा पुष्कर की पांच कालबेलिया नर्तकियां बनीं। उन्होंने सारी दुनिया को एक बार फिर कालबेलिया के सम्मोहन से जकड़ दिया। ये लड़कियां हैं—कुसुमी, मीरा, सुनहरी, रेखा और उनके साथ गुलाबो भी। ये अजमेर के गनाहेड़ा रोड पर न्यू कॉलोनी और देवनगर के बीच के इलाके में झोपड़ों में रहती हैं। 
इन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों के उद्घाटन के मौके पर नृत्य का जादू दिखाया। एक तरफ ढपली, झांझरी, रावणहत्था और अलगोजा की धुन थी और दूसरी तरफ कालबेलिया की थिरकन। लोग वाह-वाह कर उठे।
यूं तो राजस्थान का कालबेलिया ने बड़ा नाम किया है, लेकिन इसके कलाकारों की फ़िक्र किसी ने भी नहीं की। साल 2007-08 के बजट में कालबेलिया स्कूल ऑफ डांस की शुरुआत करने की घोषणा की गई थी। इसके लिए एक करोड़ रुपये आवंटित भी किए गए थे पर कई साल गुज़र जाने के बाद भी इस स्कूल की शुरुआत तक नहीं हो सकी है।
संस्थान बनाने के लिए जयपुर के हाथीगांव के पास जयपुर विकास प्राधिकरण ने 1.25 हेक्टेयर ज़मीन का आवंटन किया। चारदीवारी भी बनवाई गई पर अब ये ज़मीन बेकार पड़ी है। 7 करोड़ रुपये के इस प्रोजेक्ट में बाद में कोई राशि जारी नहीं की गई। प्रशासन एक बार फिर सुस्त पड़ा है। किसी को कालबेलिया के उत्थान की फ़िक्र नहीं है। अफ़सोस, जो नृत्य राजस्थानी लोकसंगीत की पहचान है, उसके फ़नकारों की ही कोई पहचान नहीं। कम से कम सरकारी फाइलों में तो वो अब भी अपना वज़ूद तलाश रहे हैं।
कहने की बात नहीं कि कालबेलिया नृत्य का संस्थान बन जाता, तो सरकार की आमदनी बढ़ती और इस फ़न से जुड़े फ़नकारों का नाम भी होता। यही नहीं, इस नृत्य को संरक्षित रखा जा सकता, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण सच यही है कि कालबेलिया की नृत्यशैली और इसके कलाकार अब तक अपना संरक्षक ढूंढ़ रहे हैं, जो सत्ता और सियासत के बीच कहीं खो सा गया है। कबीलाई संस्कृति से निकलकर कालबेलिया नृत्य की चमक बिखेरने वाले युवक-युवतियां चाहते हैं—उनके जीवन में भी थोड़ी-सी रोशनी भर जाए। क्या ऐसा होगा?
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Bachpan, Barish or Chay

बचपन, बारिश और चाय


गरम-गरम सांसों की सरसराहट ने कहा,हाथ में गरम-गरम चाय की एक जोड़ी प्याली उठाओ. चलो, बस चलो, चल दो, लोग सुनें कदमों की आहट. एक जो तुम्हारे पैर हों, दूसरे तुम्हारे साथी के. हम चले, तभी दो बूंदें आसमान से उतरीं, गिरने लगीं तो अधखुली आंखों ने,पलकों ने, गैर-अघाई बाहों ने उन्हें लोक लिया...धीरे-धीरे बारिश बढ़ी, भीगने लगे हम, मन में आग दहकती हुई, पानी पड़ा और उठा धुआं. यादों का ऐसा धुआं, जिनमें कुछ सीलने, सुलगने की महक शामिल है...याद आया बचपन, धुंधलाया पर नए-नकोर बुशर्ट जैसा...चेहरे पर छा गया एक रुमाल, यादों की मीठी महक से महकता हुआ...
बहुत दिन बाद जुर्राबें उतार, पार्क की हरी घास पर नंगे पैर टहलने का दिल किया...दफ्तर का वक्त था, दस्तूर भी न था,फिर भी जूते फेंके टेबल के नीचे, मैं और वो...नहीं तुम नहीं, वो भी नहीं...एक और साथी...पार्क की ओर चल दिए...हम चाय की प्याली लिए पार्क की एक बेंच की दीवाल पर ऊपर उठंगे हुए...साथी से कहा, घास पर चलें पर वो नहीं माना...उसके कपड़े गंदे हो जाते...मैं नीचे आ गया...वहां ढेर सारा पानी था, गंदगी भी रही होगी पर नहीं...घास महक रही थी...पानी भी मुझे अपनी ओर खींच रहा था...मैं एक बड़ा--कमाऊ और जिम्मेदार इंसान नहीं, छोटा सा बच्चा बन गया था...बारिश थम गई है...मैं फिर जुर्राबें पहनकर दफ्तर में आ गया हूं...तुम भी साथ नहीं हो, बस कंप्यूटर है और आठ घंटे की नौकरी...बारिश फिर से आएगी न...मैं भीगूंगा और तुम भी...

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Wednesday, 22 May 2013

ढाई सौ साल पुराना है भीमेश्वरी देवी मंदिर



नवरात्र के दिनों में झज्जर स्थित 84 घंटे वाली माता भीमेश्वरी देवी मंदिर की रौनक भी देखते ही बनती है। रोजाना संकीर्तन तो होता ही रहा है, दिल्ली-एनसीआर सहित देश के अन्य हिस्सों से भी यहां खासी संख्या में भक्त पहुंचते रहे हैं। मंदिर की खासियत इसके नाम के अनुरूप छोटे बड़े 84 घंटे ही हैं। मंदिर के पुजारी पंडित शिवओम भारद्वाज बताते हैं कि इस मंदिर की स्थापना लगभग 250 साल पहले हुई थी। मंदिर में स्थापित मां की प्रतिमा भी यहीं पर जमीन के भीतर से निकली थी। पंडित जी के मुताबिक उन के पूर्वज पिछली 10 पीढ़ियों से इस मंदिर की सेवा कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि मां की प्रतिमा गोद में उठाए जब भीम इंद्रप्रस्थ से कुरूक्षेत्र के लिए रवाना हुए तो यहां पर उन्होंने थोड़ी देर विश्राम किया था व साथ ही झपकी भी ली थी। किंतु उन्होंने मां की प्रतिमा को गोद में ही रखा जबकि बेरी में भीम ने मां की प्रतिमा को लघुशंका करने के लिए गोद में से नीचे रख दिया था। ऐसे में बेरी में तो मां भीमेश्वरी देवी के रूप में स्थापित ही हो गई, जबकि यहां पर जमीन से प्रतिमा निकलने पर उनका दूसरा मंदिर बना दिया गया।
पंडिताइन संतोष भारद्वाज बताती हैं कि मां ने कुछ भक्तों को स्वप्न में दर्शन देते हुए कहा था कि जब भी मेरे दर्शनों को बेरी आना, झज्जर के मंदिर में भी जरूर जाना। तब से बेरी जाने वाले भक्त यहां भी आने लगे। उन्होंने बताया कि नवरात्र में यहां रोज संकीर्तन होता है तो चौदस को भंडारा किया जाता है। इसके अलावा हर माह की चौदस को जागरण किया जाता है। नवविवाहित दंपति यहां पर अपनी जात लगाने आते हैं तो बच्चों के बाल भी उतारे जाते हैं। सन 1989-90 में पुर्नस्थापित इस मंदिर में नियमित आरती का समय सुबह 6 और शाम के 7 बजे का है। पंडित जी ने यह बताया कि दिल्ली रोड पर झज्जर बस स्टैंड से एक किलो मीटर व बेरी से करीब 13 किलोमीटर पहले माता के इस मंदिर में दिल्ली, कोलकाता, कटक, मुंबई एवं गुवाहाटी से सबसे ज्यादा भक्त आते हैं। पंडित जी मंदिर से जुड़ी एक दिलचस्प घटना यह भी बताते हैं कि जब उनके परदादा मंदिर की सेवा करते थे तो एक बार मां की नथ चोरी हो गई। इस पर उन्होंने इस सोच के साथ पूजा करनी बंद कर दी कि जब मां स्वयं की रक्षा नहीं कर सकती तो हमारी क्या करेगी! लेकिन तीन चार दिनों के भीतर ही कोई अपने आप मां को फिर से नथ पहना गया।

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Tuesday, 21 May 2013

अनमोल वचन




हमारी जीभ कतरनी के समान सदा स्वछंद चला करती है। उसे यदि हमने दबा कर काबू कर लिया तो क्रोध आदि बड़े-बड़े अजेय शत्रुओें को बिना प्रयास के ही जीतकर अपने वश मेें कर डाला।
* बालकृष्ण भट्ट 
इंसान को सुनना सीखना चाहिए। इससे उसे यह लाभ होगा कि वह उन लोगोें से भी सीख सकेगा जो बातचीत करना तक नहीं जानते।
* भर्तृहरि 
किसी आदमी की बुराई-भलाई तब तक पता नहीं चलती जब तक वह बातचीत न करे।
* हरिभाऊ उपाध्याय 
सुधारक चाहे कितना भी श्रेष्ठ क्योें न हो, जब तक जनता उसे परख नहीं लेगी, उसकी बात नहीं सुनेगी।
* विनोबा भावे 
जो सुधारक अपने संदेश के अस्वीकार होने पर क्रोधित हो जाता है, उसे सावधानी, प्रतीक्षा और प्रार्थना सीखने के लिए वन मेें चला जाना चाहिए।
* महात्मा गांधी 
सुधार एक दिन मेें नहीं हो जाता, उसके लिए सुधारक को उपहास और विरोध सहने पड़ते हैं।
* प्रेमचंद 
*
यदि लोग अपना अपना सुधार भी कर लेें तो धीरे धीरे पूरा देश सुधर सकता है।
अमृतलाल नागर 

संकलन : राजेश मिश्रा (जगकल्याण समाचार संपादक)


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DHARMMARG: Rameshshwar Dham / रामेश्वरम यात्रा

DHARMMARG: Rameshshwar Dham / रामेश्वरम यात्रा: रामेश्वरम यात्रा : प्रियंका मिश्रा (सुपुत्री तारकेश्वर मिश्रा - संपादक-प्रभात खबर, कोलकाता)  द्वारा विशेष रूप से लिखी गई आलेख है। और वि...

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DHARMMARG: Ram Janma Bhoomi-Babri Masjid reality

DHARMMARG: Ram Janma Bhoomi-Babri Masjid reality: राम जन्म भूमि बनाम बाबरी मस्जिद की सच्चाई अयोध्या में सदियों से चले आ रहे राम जन्म भूमि बनाम बाबरी मस्जिद के ऐतिहासिक विवाद का वर्त...

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DHARMMARG: सबरीमाला में अय्यप्पा स्वामी विराजते हैं

DHARMMARG: सबरीमाला में अय्यप्पा स्वामी विराजते हैं: सरनम अय्यप्पा / Sarnam  Ayyappa - राजेश मिश्रा ये तो आप जानते ही होंगे कि अय्यप्पा स्वामी मंदिर करोड़ों हिंदुओं की आस्था का प्रतीक है...

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Thursday, 11 April 2013

सुबह और सोने से पहले बोलें यह हनुमान मंत्र


श्री हनुमान महायोगी और साधक हैं। श्री हनुमान के चरित्र के ये गुण संकल्प, एकाग्रता, ध्यान व साधना के सूत्रों से जीवन के लक्ष्यों को पूरा करने की सीख देते हैं। इस संदेश के साथ कि अगर तन, मन और कर्म को दृढ़संकल्प, नियम और अनुशासन से साध लिया जाए तो फिर कोई भी बड़ा या कठिन लक्ष्य पाना बेहद आसान है।- राजेश मिश्रा 

हर दिन असफलता व निराशा को पीछे धकेल, जीवन से जुड़े नए-नए लक्ष्यों को भेदने के लिए अगर शास्त्रों में बताए श्री हनुमान चरित्र के अलग-अलग 12 स्वरूपों का ध्यान एक खास मंत्र स्तुति से किया जाए तो हर दिन बहुत ही सफल, शुभ व मंगलकारी साबित हो सकता है।

जानिए धर्मग्रंथों में बताई यह खास हनुमान मंत्र स्तुति। इसे मंगलवार, शनिवार या हनुमान उपासना के खास अवसरों के अलावा हर रोज सुबह या रात को सोने से पहले स्मरण करना न चूकें -

हनुमानञ्जनी सूनुर्वायुपुत्रो महाबल:।

रामेष्ट: फाल्गुनसख: पिङ्गाक्षोमितविक्रम:।।

उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशन:।

लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा।।

एवं द्वादश नामानि कपीन्द्रस्य महात्मन:।

स्वापकाले प्रबोधे च यात्राकाले च य: पठेत्।।

तस्य सर्वभयं नास्ति रणे च विजयी भवेत्।।


इस खास मंत्र स्तुति में श्री हनुमान के 12 नाम, उनके गुण व शक्तियों को भी उजागर करते हैं । ये नाम है – हनुमान, अञ्जनीसुत, वायुपुत्र, महाबली, रामेष्ट यानी श्रीराम के प्यारे, फाल्गुनसख यानी अर्जुन के साथी, पिङ्गाक्ष यानी भूरे नयन वाले, अमित विक्रम, उदधिक्रमण यानी समुद्र पार करने वाले, सीताशोकविनाशक, लक्ष्मणप्राणदाता और दशग्रीवदर्पहा यानी रावण के दंभ को चूर करने वाले।

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Manav Seva hi Ishwar Seva hai...

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